उत्तराखंड की पर्वतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और राज्य में सेब उत्पादन को नए आयाम तक पहुंचाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। देहरादून जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के 28 उत्साही किसानों के दल को आधुनिक बागवानी तकनीकों का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण लेने के लिए हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित प्रतिष्ठित डॉ. वाई एस परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री नौणी भेजा गया है। मंगलवार को प्रदेश के कृषि एवं उद्यान मंत्री गणेश जोशी ने इस किसान दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह पांच दिवसीय 'सेब सघन बागवानी प्रशिक्षण' कार्यक्रम 3 से 7 नवंबर तक आयोजित किया जा रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों में सेब उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने और किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए राज्य सरकार ने आधुनिक बागवानी तकनीकों पर जोर देना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में देहरादून के ग्रामीण क्षेत्रों के 28 किसानों को पांच दिवसीय विशेष प्रशिक्षण के लिए हिमाचल प्रदेश रवाना किया गया। कृषि मंत्री गणेश जोशी ने किसानों के दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह दल हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित डॉ. वाईएस परमार विश्वविद्यालय नौणी में 3 से 7 नवंबर तक आयोजित सेब सघन बागवानी प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लेगा। यहां किसान आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान हासिल कर अपने बागानों में उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने के गुर सीखेंगे। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को सेब के पौधों की कटाई-छंटाई, पौध रोपण, उर्वरक प्रबंधन, जैविक खाद के उपयोग, बडिंग-ग्राफ्टिंग, फल उत्पादन की वैज्ञानिक पद्धतियों और तुड़ाई के बाद फलों के रखरखाव की जानकारी दी जाएगी। इसके साथ ही सेब की पैकेजिंग, सॉर्टिंग, ग्रेडिंग और बाजार में बेहतर कीमत प्राप्त करने के लिए विपणन की तकनीकों से भी परिचित कराया जाएगा। सरकार का उद्देश्य किसानों को केवल पारंपरिक खेती तक सीमित न रखकर उन्हें आधुनिक और व्यावसायिक बागवानी से जोड़ना है। कृषि मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद किसान स्वयं आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करेंगे और अपने क्षेत्रों के अन्य किसानों को भी जागरूक करेंगे। इससे प्रदेश में सेब उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि के साथ किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए क्लस्टर आधारित खेती तथा उच्च मूल्य वाली फसलों को प्रोत्साहित कर रही है।मंत्री के अनुसार प्रदेश में 808.79 करोड़ रुपये की लागत से सेब की अति सघन बागवानी योजना संचालित की जा रही है। इसके तहत पांच हजार हेक्टेयर क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से सेब के बागान विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस योजना में किसानों को 60 प्रतिशत तक अनुदान देने का प्रावधान है। अति सघन बागवानी के माध्यम से सीमित भूमि में अधिक पौधे लगाकर उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। सेब उत्पादन के साथ-साथ किसानों को फसल का उचित मूल्य दिलाने के लिए सरकार तुड़ाई के बाद प्रबंधन व्यवस्था विकसित करने पर भी काम कर रही है। इसके लिए 144.55 करोड़ रुपये की लागत से नियंत्रित वातावरण वाले शीत भंडारण (सीए स्टोरेज) और छंटाई-श्रेणीकरण इकाइयां स्थापित की जा रही हैं। इस योजना के अंतर्गत 50 से 70 प्रतिशत तक अनुदान का प्रावधान है। इससे किसानों को फसल सुरक्षित रखने, गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार की मांग के अनुसार उत्पाद उपलब्ध कराने में सहायता मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा 80 करोड़ रुपये की लागत से सेब की अत्याधुनिक पौधशाला योजना भी संचालित की जा रही है। इसके तहत 400 एकड़ क्षेत्र में नर्सरी विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौध उपलब्ध कराने और बागवानी के विस्तार को गति देने की योजना है। कृषि मंत्री ने कहा कि भविष्य में जिला योजना और राज्य सेक्टर की योजनाओं के माध्यम से किसानों का चयन कर प्रदेश के भीतर और बाहर प्रशिक्षण दिलाया जाएगा। सेब के साथ कीवी उत्पादन और मधुमक्खी पालन जैसे क्षेत्रों में भी किसानों को प्रशिक्षित करने की योजना है। सरकार का मानना है कि कृषि के विविधीकरण से किसानों के लिए आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित होंगे और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। उत्तराखंड में सेब उत्पादन के लिहाज से उत्तरकाशी जिला प्रमुख स्थान रखता है। यहां हर्षिल घाटी, नौगांव फल पट्टी, मोरी क्षेत्र के बंगाण और नैटवाड़ इलाके में बड़े पैमाने पर सेब की पैदावार होती है। इसके अलावा नैनीताल, पौड़ी, देहरादून के ऊंचाई वाले क्षेत्रों और पिथौरागढ़ सहित अन्य पर्वतीय इलाकों में भी सेब की खेती की जाती है। सरकार की इन योजनाओं और आधुनिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों से पर्वतीय किसानों को बागवानी के नए अवसर मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इन प्रयासों की वास्तविक सफलता बेहतर पौध, समय पर तकनीकी सहायता, भंडारण सुविधाओं और किसानों को बाजार में उचित मूल्य मिलने पर निर्भर करेगी। यदि इन सभी व्यवस्थाओं को प्रभावी ढंग से जमीन पर उतारा जाता है तो सेब उत्पादन उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार, स्वरोजगार और पलायन रोकने का मजबूत आधार बन सकता है।