देहरादून। उत्तराखंड में अब औपनिवेशिक और अंग्रेजी हुकूमत के दौर के पुराने सिंचाई नियम-कायदे नहीं चलेंगे। धामी सरकार ने 151 साल पुराने ब्रिटिश कालीन कानून को पूरी तरह समाप्त कर राज्य का अपना आधुनिक और सशक्त कानून बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। भराड़ीसैंण स्थित विधानसभा भवन में आयोजित दो दिवसीय सत्र के पहले दिन सरकार ने वर्ष 1873 के 'उत्तरी भारत नहर एवं जल निकास अधिनियम' को निरस्त करते हुए नया 'उत्तराखंड सिंचाई एवं जल निकासी विधेयक' सदन के पटल पर पेश कर दिया।
उत्तराखंड में सिंचाई और जल निकासी व्यवस्था को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप ढालने की दिशा में धामी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। अंग्रेजों के शासनकाल में बने वर्ष 1873 के उत्तरी भारत नहर एवं जल निकास अधिनियम को निरस्त करने और उसके स्थान पर राज्य का अपना कानून लागू करने के लिए सरकार ने विधानसभा में उत्तराखंड सिंचाई एवं जल निकासी विधेयक पेश किया है। नया कानून लागू होने पर सिंचाई विभाग को जलस्रोतों के प्रबंधन, नहरों के रखरखाव और पानी की चोरी तथा अतिक्रमण रोकने के मामले में अधिक अधिकार मिल सकेंगे। गैरसैंण स्थित भराड़ीसैंण विधानसभा में मंगलवार को पेश किए गए इस विधेयक का उद्देश्य पुराने कानून के उन प्रावधानों की जगह नए नियम लाना है, जो मौजूदा परिस्थितियों में अप्रासंगिक हो चुके हैं। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद भी वर्ष 1873 का कानून यहां लागू रहा। बदलती जरूरतों, जलस्रोतों के संरक्षण और सिंचाई व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए अब राज्य सरकार ने अलग कानून बनाने की पहल की है। धामी मंत्रिमंडल की हालिया बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। प्रस्तावित अधिनियम में सिंचाई विभाग को नदियों, गाड-गदेरों, नहरों और गूलों से जुड़े अतिक्रमण तथा पानी की चोरी के मामलों में कार्रवाई करने और जुर्माना वसूलने का अधिकार देने का प्रावधान है। जुर्माने की दरें सरकार तय करेगी। इससे जलस्रोतों और सिंचाई ढांचे पर अवैध कब्जों को रोकने में विभाग की भूमिका मजबूत हो सकती है। विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि नदियों, गाड-गदेरों और अन्य जलस्रोतों से पानी लेने के लिए सिंचाई विभाग की सहमति आवश्यक होगी। इसका उद्देश्य जल के उपयोग और वितरण को व्यवस्थित करना तथा उपलब्ध पानी का नियमानुसार इस्तेमाल सुनिश्चित करना है। नहरों के निर्माण और रखरखाव के लिए विभाग को अतिरिक्त शक्तियां देने का प्रस्ताव किया गया है। साथ ही रखरखाव में लापरवाही होने पर जवाबदेही तय करने की व्यवस्था भी शामिल है। इससे सिंचाई ढांचे की देखरेख और मरम्मत को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। खेती के लिए नहरों से पानी लेने की व्यवस्था में भी प्रावधान किए गए हैं। प्रस्ताव के अनुसार, फसल की सिंचाई के लिए पानी की अनुमति फसल पकने तक जारी रहेगी। यदि पानी के वितरण की व्यवस्था में बदलाव किया जाता है, तो उसे लागू करने से पहले संबंधित हितधारकों को कम से कम एक फसली मौसम का समय देना होगा। इससे किसानों को नई व्यवस्था के अनुरूप तैयारी करने का अवसर मिलेगा। प्रस्तावित कानून में मवेशियों के लिए नहरों से पानी निशुल्क लेने की सुविधा का प्रावधान भी है। इसके अतिरिक्त तालाबों और प्राकृतिक गड्ढों को नहरों के पानी से भरकर सिंचाई में उपयोग करने की व्यवस्था की जा सकेगी। इससे स्थानीय स्तर पर पानी के उपयोग के विकल्प बढ़ सकते हैं। विधेयक में जलापूर्ति में विफलता, बाढ़ अथवा आपदा के कारण फसलों को नुकसान पहुंचने की स्थिति में नियमानुसार मुआवजा देने का प्रावधान भी प्रस्तावित है। हालांकि, मुआवजे की पात्रता और भुगतान निर्धारित नियमों के अनुसार ही होगा। केंद्र की अपेक्षा के अनुरूप संविधान-पूर्व कानूनों की समीक्षा और उन्हें बदलने की प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार ने यह कदम उठाया है। अब विधेयक पर विधानसभा की प्रक्रिया पूरी होने और कानून लागू होने के बाद ही इसके प्रावधान प्रभावी होंगे। नया अधिनियम उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों, कृषि जरूरतों और जलस्रोतों के संरक्षण के लिए कितना कारगर साबित होता है, यह इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।